Saturday, October 15, 2011

काश मैं खुद को समझ पाती
अपनी कही अनकही बातें
है कितना मुश्किल खुद से मिलना 
क्या हम बेगानों की बात करें|
हर लफ्ज़  खुद मुझ से बेगाना मेरा
जज्बातों के बहाव मैं कभी बह जाती 
कभी पाषाण ह्रदय बन जाती|
कभी छोटी सी भी बात चुभ जाती 
कभी हर बात से बेपरवाह हो जाती |
क्या कहे उस इन्सान का 
जो खुद ही खुद से न मिल पाए
क्या किसी और से मिलना |
है कई सवाल खुद से 
है कई जबाब उनके 
पर किस  जबाब को दिल माने सही 
किस जबाब को नकारे मन मेरा
है उल्जनो  का ये सफ़र 
लेने कही निर्णय महत्वपूर्ण 
करनी तय भूमिका निर्णायक |
है एक ही सवाल खुद से 
पर उस का ही जवाब नही |

  
 


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