कुछ लफ्ज़ो मे
कुछ अल्फाजों में
बयाँ हो जाए
ये वो एहसास नहीं।
जिस जुस्तजू की हमे उम्मीद
उसपे अब इक्तियार नहीं।
अश्को से बहे जो मोती
दामन में अपने समेटे
तन्हाइयो में अपनी सिमटे
चाहतों को दफना के अपनी
ख़ामोशी को ओढ़े हैं।
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