थमे हुए अपने कदमों से पुछा मैंने
किस बात का डर है तुझे
क्यूँ तु यूँ अनायास ही ठहर गया ऐसे
एक धीमी सी सिहरन हुई दिल में
जैसे कुछ पीछे छूट गया मूझसे।
देखा देखि ज़माने की
मैं यूँ चलने लगी
या लगी मैं भागने
खुद को ही कर दिया
दूर अपनी परछाई से ।
दूर अपनी परछाई से ।
अब रुकके सोचती हूँ
अनजाने ही ये कहाँ आ गयी मैं
मंजिल से अपनी कोसो दूर
कैसे खो गयी इस चकाचौंद मैं
क्यूँ बिसरा दिए अपने सपनो को।
ये कैसी कसमकस है
है ये कैसी राहे......
ना मुड के पीछे चल पाऊँ
ना ये कदम आगे बढ़ पाये ।
एक मझधार सी क्युं
लगने लगी जिंदगी मुझे ।
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