मेरे ख्वाबों का साया क्यूँ होता मुझसे बेगाना
जिस लम्हे में सिमट जाती मेरी ख़ुशी
हर जो पल मेरा अपना था
दिल मैं विश्वास का एक तराना था
रेत की तरह मेरी हतेली से
कैसे कब यूँ निकल गया
था कुछ कसूर इन ख्वाबों का
या कुछ अधकचरे विश्वाश का
एक दरक्त जो आसरा था
अगिनत चहचाहट अपने मैं समेटे
या कहूं एक कम्पन अपनों से दूर
सागर से कैसे कहे कोई
तुझसे अथाह भी है एक अरदास
मेरे ख्वाबों का एक साया...
जिस लम्हे में सिमट जाती मेरी ख़ुशी
हर जो पल मेरा अपना था
दिल मैं विश्वास का एक तराना था
रेत की तरह मेरी हतेली से
कैसे कब यूँ निकल गया
था कुछ कसूर इन ख्वाबों का
या कुछ अधकचरे विश्वाश का
एक दरक्त जो आसरा था
अगिनत चहचाहट अपने मैं समेटे
या कहूं एक कम्पन अपनों से दूर
सागर से कैसे कहे कोई
तुझसे अथाह भी है एक अरदास
मेरे ख्वाबों का एक साया...